supreme court ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि मनी लांड्रिंग मामलों में भी जमानत एक नियम है और जेल अपवाद। यह फैसला झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के सहयोगी प्रेम प्रकाश को मनी लांड्रिंग के एक मामले में जमानत देते समय सुनाया गया। कोर्ट ने कहा कि जांच एजेंसी प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) द्वारा दर्ज अवैध खनन के मामले में आरोपी को हिरासत में लेकर दिया गया सुनें किसी भी अपराध का आरोपी व्यक्ति उसके खिलाफ कोई भी बयान देता है जो उसके अपराध को साबित कर सकता है, सीधे तौर पर सबूत नहीं माना जा सकता।
जमानत का नियम सुप्रीम कोर्ट की बेंच, जिसमें जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस केवी विश्वनाथन शामिल थे, ने कहा कि पीएमएलए (धनशोधन निवारण अधिनियम) के तहत मामलों में भी जमानत एक नियम है, जबकि जेल भेजना बदनामी है। यह संविधान के तहत स्वतंत्रता के अधिकार के अनुरूप है।

supreme court ने स्पष्ट किया कि ईडी की हिरासत में दिए गए इकबालिया बयान को सबूत के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता है, क्योंकि यह मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होगा। कोर्ट ने भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 25 के तहत इस पर प्रतिबंध लगाया है।
कोर्ट ने कहा कि यदि सह-अभियुक्त किसी के खिलाफ बयान देता है, तो वह केवल उसी आधार पर दूसरे के खिलाफ मामला शुरू करने का पर्याप्त सबूत नहीं हो सकता। हिरासत में दिए गए बयान को लेकर आरोपी की मानसिक स्थिति को समझना जरूरी है, क्योंकि दबाव में कई बार आरोपी अपराध स्वीकार कर लेता है।
ऐसा ही एक दिन पहले ही दिल्ली एक्साइज मामले में बीआरएस नेता के. कविता को जमानत देते वक्त कोर्ट ने कहा था कि दोषसिद्धि के बिना लंबे समय तक किसी को जेल में रखना बिना मुकदमे के सजा के बराबर होगा।
– khushi sharma
